Kabir ke dohe भारतीय साहित्य और आध्यात्मिक ज्ञान का अमूल्य हिस्सा हैं। संत कबीर दास के दोहे सरल भाषा में गहरे जीवन-सत्य और नैतिक संदेश देते हैं।
Kabir Das के दोहे आज भी लोगों को सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन में सादगी, सत्य और भक्ति का महत्व समझाते हैं।इस लेख में हम 10 प्रसिद्ध Kabir ke dohe with meaning जानेंगे, जो जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ: जब इंसान दूसरों में बुराई खोजता है तो उसे कोई बुरा नहीं मिलता, लेकिन जब वह अपने अंदर देखता है तो समझता है कि सबसे ज्यादा कमी उसी में है।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
अर्थ: हर काम समय के अनुसार ही होता है। जैसे माली कितना भी पानी दे, फल तो मौसम आने पर ही लगता है।
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर्थ: जो हमारी आलोचना करता है उसे अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को सुधार देता है।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।
अर्थ: जो काम कल करना है उसे आज कर लो और जो आज करना है उसे अभी कर लो क्योंकि समय कभी किसी का इंतजार नहीं करता।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ: मनुष्य को ऐसा होना चाहिए जो अच्छे विचारों को अपनाए और बुरे विचारों को छोड़ दे।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं, फल लगे अति दूर।
अर्थ: केवल बड़ा या अमीर होने से कोई फायदा नहीं यदि उससे दूसरों को लाभ न मिले।
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय
जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय।
अर्थ: अधिकतर लोग भगवान को दुख में याद करते हैं, लेकिन यदि सुख में भी याद किया जाए तो दुख कम हो जाते हैं।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।
अर्थ: हमें हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे दूसरों को भी शांति मिले और हमें भी।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ: केवल माला जपने से कुछ नहीं होता, असली बदलाव मन के अंदर होना चाहिए।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ: मनुष्य की जाति नहीं बल्कि उसका ज्ञान और गुण महत्वपूर्ण होते हैं।



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